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Reposting तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ

दो पल का साथ फिर ज़िन्दगी तन्हा, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ|
दर्द फुग़ान हो जाने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 1

हवाएँ चुपके से कहती हैं कि मिलन की रुत आई तुम कहाँ हो,
पर तुमसे बिछडने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 2

तुम आओगी, बोलोगी, हँसोगी, बडबडओगी, चली जाओगी,
रुख़सत में तड़पने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 3

मेरे साँसों में अपनी ख़ुशबू छोड जाओगी, वह बहकाता रहेगा,
उस याद में सिसकने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 4

घर आओगी तो बातें मत करना, दीवारें सुनकर देर दोहराएँगी,
वह गूँज सुनकर रोने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 5

किसी चीज़ को हाथ मत लगाना, मेरा इबादतख़ाना भर गया है,
यह इख़लास चूकने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 6

नज़राने मत दिया करो, शुक्रिया कहना मेरे बस की बात नहीं,
ज़िन्दगी कम पडने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 7

तुम्हारी याद से पैर ज़मीन पर नहीं टिकते, तुम्हारा दीदार तौबा,
ख़्वाब टूटकर गिर जाने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 8

हलकी बारिश की बूँदें फिर तुम्हारी आँसुओं की याद दिलाती हैं,
इन्हें न समझने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 9

सोचता हूँ कि तुम्हारा हँसना या रूठना मेरे होश को भुला देगा,
तुमसे बातें करने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 10

सीरत की कमियाँ तुमसे क्या छुपाऊँ, यह आँखें ढूँड ही लेती हैं,
इन नज़रों में गिरने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 11

न जानूँ मैं कभी, किस बात पर तुम खुश होती हो, और किस बात पर ख़फा,
तुम्हे न समझने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 12

ऐ हसीन यह नाम तुम्हारा, इससे इतराने से नहीं थकते यह होंठ,
यह मिठास पिघलने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 13

तुम्हारी देहलीज़ पार करके लगता है के जन्नत में दाख़िल हुआ हूँ,
यह ख़्वाबगाह उजड़ जाने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 14

अपनी तारीफ़ किसी सुख़ानवर से करवाओ, मुझसे तो नहीं होगा,
अल्फ़ाज़ का साथ छूटने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 15

तुम्हारा हर नुख़्स सोने और चान्दी के वरक़ से छुपाया है मैंने,
यह नक़ाब उतरने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 16

तुम राग छेडती हो तो परिन्दे गुनगुनाना छोडकर सुनने लगते हैं,
यह समा बिखरने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 17

तुम पलकें झुकाकर देखती हो तो हर मन्ज़र से अन्धा हो जाता हूँ,
इन आँखों के खुलने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 18

काँच की छूडियाँ मत पहना करो, टुट गयीं तो खरोंच पड जाएगी,
आहट न सह पाने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 19

तुम क़ाफ़िया, तुम रदीफ़, तुम बहर हो, यह ग़ज़ल मेरा तुम पर क़ुरबान,
अल्फ़ाज़ न पिरोने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 20

ख़ानाबदोश को क्या मुकाम हासिल, मंज़िल हाज़िर होते भी हूँ फ़ना,
तुम्हे पाकर खोने का डर इतना, तुमसे मिलने से मुकर जाता हूँ| 21

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

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