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आह-ए-ग़ज़ल

दीपक का मुरझाता नूर कह रहा है, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो;
सूरज की मरती किरनें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

झोंका न जाने कैसे तेरी ज़ुल्फ़ों की महक ले आता है,
यह हवाएँ चुपके से कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

सावन के हर धुन्धले परछाई में तेरा ही एहसास मौजूद है,
मद्धम बारिश की बूँदें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

नदी के आब ए सफ़ा में तेरा ही चेहरा दिखता है मुझे,
दरिया की यह लहरें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

चहचहाते परिन्दे तेरी ही अवाज़ की याद दिलाते हैं,
जंगल की पगडन्डियाँ कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

मंज़िल की तलाश में निकल चुका हूँ, महक है पर फूल कहाँ,
यह मनडराती तितलियाँ कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

यह 'ख़ाना बदोश'अल्फ़ाज़ भटक रहे हैं बहर की तलाश में,
सियाही की लकीरें कह रही हैं, यह आह-ए-ग़ज़ल सुन लो |

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

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