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चिराग़ लिए भटक रहा हूँ

इनसानों की दुनिया है, फिर भी लगती है इनसानियत बेहोश,
हर आदमी ग़ाज़ी बन गया है, बिना सोचे मरने को सरफरोश,
मैं चिराग़ लिए भटक रहा हूँ, दर उल अमन कहाँ मिलेगा,
ख़्वाबों की देहलीज़ कब कहेगी, पनाह में आ जाओ 'ख़ाना बदोश'?

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

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