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सोनेट हेलेन

रोशनदान जलाए, तुम अपनी ज़िन्दगी की शाम में,
वहशत में नशीन, आहिस्ता, आहिस्ता आहें भरकर
तुम कहोगी, मेरे अशीर दोहराते, ता'ज्जुब करकर,
खुद रोनसार्द ने दाद दिया था, ज़िन्दगी के सहर में|

उस वक़्त एक ना होगा ख़िदमतगार, जो हाल-ए-मलाल में,
ग़फलत में डूबता हुआ तुम्हारे शिकवे ना सुनकर,
पर मेरा ज़िक्र होते बक्षेगा यक लख़्त नींद से उठकर,
उस शा'यर को जिसने तुम्हें अबरी किया नज़्मों में|

मैं तो गढ़ा रहूँगा ज़मीन तले, एक याद बने
तुम ज़'इफ, गिलाह करोगी हर लम्हा, नाशाद बने|
मेरा आरामगाह पीपल की ठंडी पनाह में होगा

तुम तन्हा बुज़ुर्गा अपने गुमान का करोगी ज़ार|
मेरा ऐतबार करो तो कल का ना करो इन्तेज़ार
बटोरो हर गुलाब जो आज तुम्हारे राह में होगा|

Transcreated from Pierre de Ronsard's Sonnet pour Hélène. I have tried to keep the structure intact, except for interchanging lines 10 and 11 for sake of rhyme, and changing the original's myrtle to the more familiar peepal, and removing references to spinning wool.

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