Friday 17 December 2010

अगर काँटा ही समझेंगे

हमें गुलदाउदी समझिये, बाग़ान में बहार ले आइये;
या महज़ गुल ही समझकर अपने ज़ुल्फ़ों की निख़ार बढ़ाइये|
अगर काँटा ही समझेंगे, तो उससे भी सहमत है ख़ानाबदोश,
बतौर सूई अपने आशिक़ के ख़तों का मुख़्तियार बनाइये||

हमें गुलदाउदी समझकर, हम ही से गुलिस्तान सजाइये;
या गुल ए अहमर समझकर अपने ज़ुल्फ़ों को बाग़ान बनाइये|
अगर काँटा ही समझेंगे, तो उससे भी सहमत है ख़ानाबदोश,
बतौर सूई अपने आशिक़ के ख़तों का निगेहबान बनाइये||

(यह और भी अच्छा बन सकता है, क्या आप मदद फ़रमाएँगे?)

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