Tuesday 12 October 2010

तलाश

मेले के गुब्बारे भी ख़ामोशी की तलाश में भटकते होंगे,
पूनम का चान्द अमावस की आस रखता होगा,
शहर की बसें किसी गाँव का रस्ता ढूँढती होँगी,
सागर की मछलियाँ किसी वीरान कुएँ का ख़्वाब देखतीं|

मैंने न तलाश की न ख़्वाब देखे,
इन सियाही की लकीरों में
मैं कबसे गुमशुदा हूँ|

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