Saturday 15 August 2009

मुन्तज़िर आँखें

तुम आओगी, तुम आओगी, तुम्हारे ख़यालों में मुन्तज़िर आँखें
किनारे के तलाश में भटकती लहरों के जैसे मुन्तज़िर आँखें

फूलों के ख़ुश्बू में ख़ुमार होकर उन्हें ढूँढते हुए यहाँ वहाँ
भटकती मन्डराती हुई एक एक तितली के जैसे मुन्तज़िर आँखें

पहाड़ों से उतरकर, खेतें पार करकर, साहिल कहाँ साहिल कहाँ
सागर के तलाश में दौड़ती हुई नदी के जैसे मुन्तज़िर आँखें

समन्दर से उठकर हवाओं से, आसमानों से ज़मीन का राह पूछकर
इस तलाश में आए हुए काले बादल के जैसे मुन्तज़िर आँखें

हज़ारों साल एक ही मक़सद में ख़ुद को जलाते हुए कायनात को पार
सूरज के तलाश में आए दुमदार तारे के जैसे मुन्तज़िर आँखें

तुम्हारी तारीफ़ के लिए बेआल्फ़ाज़ खड़ा हुआ यह ख़ाना बदोश
कान्हा की इबादत में बैरागी मीरा के जैसे मुन्तज़िर आँखें

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