Thursday 13 August 2009

परछाई

ना मैंने कुछ कहा,
ना उसने|
बस वह आयी,
अंगूठी उतारी
और मे‍ज़ पर रख दी|
वे कान की बालियाँ
जो मैंने
पिछले दिवाली
को दी थी,
वे भी|
ना मैंने कुछ कहा,
ना उसने|
मैंने दो प्याले
चाय मंगवायी,
मेरी सादी,
उसकी हमेशा जैसी -
बिना शक्कर,
बिना दूध|
वे सब ख़त
जो मैंने लिखे,
एक नाज़ुक धागे
से बान्धकर|
वह मोबाइल फ़ोन -
तोहफ़ा ए ईश्क़ -
डिब्बे के साथ|
ना मैंने कुछ कहा,
ना उसने|
चाय आयी,
हमने पी,
मैंने बिल भरा|
उसने हैन्डबैग खोला
अपने हिस्से के
बाईस रुपये रखे
और चली गयी|
ना मैंने कुछ कहा,
ना उसने|

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