Thursday 4 November 2010

ghazal in progress

यह चिराग़ रौशन कर भी अन्धेरा है, जो तेरा नूर ए रूह नामौजूद है,
जब तिश्नगी जलाकर बुझ ना पाए, यूरिश ए मॊहब्बत कम ना होगी|

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