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कोई फ़िक़्र नहीं

सालों अकेला रह जाने का कोई फ़िक़्र नहीं
बेबस राह देखते रह जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

जब तेरा साथ ही नहीं था, बिछड़ने का क्या डर
तन्हाई में तरस जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

यादों की बैसाखी पकडे कटती है ज़िन्दगी
इन्हें कभी भी ख़ो जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

लिपट जाऊँ मैं तेरी बिछड़ाहत के नूर से
इस पतंगे को जल जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

यह चाहत तेरी, न मरने देती है न जीने
पर छटपटाते रह जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

अकेले पन की अब आदत लग गयी है सनम
तेरे बिन जीवन जी जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

अब तू आएगी तो घबरा जाए रामेश, लेकिन
आ जा, तेरे आने जाने का, कोई फ़िक़्र नहीं

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

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