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लहरें

यह कैसी लहरें हैं ज़ीस्त-ए-इन्सान में
उठने प जिनकेे, सर ताजपोश है क़िस्मत से
और बग़ैर जिनके, यह कारवाँ-ए-ज़िन्दगी
कैद है मलाल ख़लिश-ओ-जिद्दोजिहद में
ऐसी ही लहरों पर शनावर हैं हम अब
क़बूल कीजिए जब पेश है ख़िदमत इनकी
या पाएँ गुमशुदा यह ख़्वाब-ओ-मनसूबे

(With apologies to William Shakespeare)

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