Skip to main content

तमाशा

क्या उस फ़क़ीर से हसद रखूँ, जो बिन भुगतान दुनिया का तमाशा देख रहा है
या फिर ख़ुद पर मुस्कुराऊँ, जो बिन रोज़ी तमाशेबाज़ बन बैठा है

(मुश्ताक़ के मदद से)

Comments