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दीवार

आज मैं उस सड़क से गुज़रा,
जिसपर हमारा कालेज खड़ा है.

और वह दीवार याद आयी|
वही दीवार, जो तुमने और मैंने
इतने साल भुलाने की कोशिश की|

पता नहीं क्या चली तब मन में|
मैं गया उसी कोने में,
जहाँ दिल का आकार बनाकर
बायीं ओर पर मेरे
दायीं ओर पर तुम्हारे
इनिशियल हमने खरोंचे थे|

उस दीवार पर अब शायद
पेंट की एक परत चढ़ गयी है.
या फिर हमारी ही तरह, बीसों युवाओं ने,
उसी मासूमियत से, उन्हीं ही ईरादों से,
अपने नाम तराशे होंगे.

पर नहीं|

वह दीवार वैसी ही है|
वह दिल का आकार,
वह इनिशियल बरकरार हैं|
बारिशों, हवाओं के वजह से
धुंधले होने लगे हैं,
शायद कुछ और साल में
पूरी तरह मिट जाएँगे|

मैं चला आया वहाँ से|
शायद जाना ही नहीं चाहिये था|

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