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बिन बहर के ग़ज़ल

बिन जुनून के चाहत ऐसी, बिन बहर के ग़ज़ल जैसी,
बिन इज़्तिराब के 'श्क़ ऐसी, बिन बहर के ग़ज़ल जैसे |

हर लफ़्ज़ हर याद में ढूँढता हूँ, तुम्हारी आवाज़ की सरगम,
हर बात बेमतलब लगती है, बिन बहर के ग़ज़ल जैसे |

वक़्त के भुलाए ख़्वाब जैसे, बिन महक के फूलों जैसे,
ज़िन्दगी बेजान लगती है, बिन बहर के ग़ज़ल जैसे |

ख़ामोशी के आसमाँ से आँसुओं की बारिश गिरा दे
बिन बादल के फ़लक ऐसे, बिन बहर के ग़ज़ल जैसे |

इन सुनसान दीवारों पर अपनी हंसी के रंग चढा दे,
बिन पनाह के मकान ऐसे, बिन बहर के ग़ज़ल जैसे |

लडखडाओ, डगमगाओ, झलक दो के तुम इन्सान हो
बिन जज़्बे के आँखें ऐसे, बिन बहर के ग़ज़ल जैसे |

यह कृति उमर बहुभाषीय रूपांन्तरक की मदद से देवनागरी में टाइप की गई है|

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